अंबिकापुर।१0 अक्टूबर। रिहन्द टाइम्स। संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय, सरगुजा शिक्षा का मंदिर कम, आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा ज्यादा बन गया है। कुलपति और कुलसचिव की आपसी खींचतान में विश्वविद्यालय की साख दांव पर लग रही है, जबकि इसका पूरा खर्च छात्रों की जेब से निकल रहा है।
बता दें कि, विश्वविद्यालय को सालाना सिर्फ 2 करोड़ रुपये मिलते हैं, जबकि कुल खर्च 6 करोड़ 80 लाख रुपये है। बाकी करीब 4.80 करोड़ की भरपाई सीधे विद्यार्थियों की फीस से होती है। ऐसे में प्रबंधन की सोच बेहतर शिक्षा के बजाय कुर्सी की लड़ाई में लगना समझ से परे है। कुलपति प्रो. राजेंद्र लाकपाले का कहना है कि, रजिस्ट्रार को अपने काम की जानकारी ही नहीं है। जांच में मिला कि रजिस्ट्रार पद की योग्यता ही उनमें नहीं है। कुलपति का आरोप है कि उन्होंने आते ही पुराने भ्रष्टाचार को रोकने की कोशिश की तो कुलसचिव कुछ ठेकेदारों के साथ मिलकर विरोध करने लगे।
इधर कुलसचिव डॉ. शारदा प्रसाद त्रिपाठी ने कहा है कि उनकी नियुक्ति शासन ने मुख्यमंत्री के अनुमोदन से की है। वे 35 साल से उच्च शिक्षा विभाग में हैं। रजिस्ट्रार का पद प्रतिनियुक्ति का है, मेरी नियुक्ति संवर्गीय प्रतिनियुक्ति पर हुई है। उन्होंने कहा है कि वे शासन का नियम मानने के लिए बैठे हैं, किसी के निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए नहीं।
ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे दोनों एक-दूसरे को देखना नहीं चाहते। ग्राम भकुरा में स्थित विश्वविद्यालय कैंपस का अधूरा भवन, मिट्टी खनन, फर्नीचर खरीदी में गड़बड़ी के आरोपों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों फीस देने वाले छात्रों को बेहतर शिक्षा मिले, इसके लिए अनुकूल माहौल मिलेगा या सिर्फ अफसरों की लड़ाई देखने को मिलेगी?

